Purusha suktam (पुरुषसूक्तम्) is hymn mentioned in Rigveda 10.90, dedicated to the Purusha, the “Cosmic Being”.

This Sukta is also found in the Shukla Yajurveda Samhita 31.1-16 and Atharva Veda Samhita 19.6

The suktam mentioned in Shukla Yajurveda Samhita has 16 verses, whereas Sukta mentioned in Rigveda, Mudgal Upanishad ( मुद्गलोपनिषद् ) consists of 18 verses. This version also has 6 verses as Uttara-narayana sukhtam in honour of Rishi Narayana.

Following is the Purusha Suktam ( पुरुषसूक्तम् ) with Hindi meaning :

शान्तिपाठः

ओं तच्छं॒ योरावृ॑णीमहे । गा॒तुं य॒ज्ञाय॑ । गा॒तुं य॒ज्ञप॑तये । दैवीः᳚ स्व॒स्तिर॑स्तु नः । स्व॒स्तिर्मानु॑षेभ्यः । ऊ॒र्ध्वं जि॑गातु भेष॒जम् । शन्नो॑ अस्तु द्वि॒पदे᳚ । शं चतु॑ष्पदे ॥ ओं शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥

अथ पुरुषसूक्तम् ॥

ॐ स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः । स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् ।
स भूमिं॑ वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा । अत्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒लम् । 1

जो सहस्रों सिरवाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्माँड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ।।1।।

पुरु॑ष ए॒वेदꣳ सर्व । यद्भू॒तं यच्च॒ भव्य।
उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नः । यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति । 2

जो सृष्टि बन चुकी, जो बनने वाली है, यह सब विराट पुरुष ही हैं। इस अमर जीव-जगत के भी वे ही स्वामी हैं और जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वे ही स्वामी हैं ।।2।।

ए॒तावा॑नस्य महि॒मा । अतो॒ ज्यायाश्च॒ पूरु॑षः ।
पादोऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ । त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि । 3

विराट पुरुष की महत्ता अति विस्तृत है। इस श्रेष्ठ पुरुष के एक चरण में सभी प्राणी हैं और तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में स्थित हैं ।।3।।

त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः । पाऽस्ये॒हाऽऽभ॑वा॒त्पुनः॑ ।
ततो॒ विश्व॒ङ्व्य॑क्रामत् । सा॒श॒ना॒न॒श॒ने अ॒भि । 4

चार भागों वाले विराट पुरुष के एक भाग में यह सारा संसार, जड़ और चेतन विविध रूपों में समाहित है। इसके तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में समाये हुए हैं ।। 4

तस्माद्वि॒राड॑जायत । वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः ।
स जा॒तो अत्य॑रिच्यत । प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः । 5

उस विराट पुरुष से यह ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ। उस विराट से समष्टि जीव उत्पन्न हुए। वही देहधारीरूप में सबसे श्रेष्ठ हुआ, जिसने सबसे पहले पृथ्वी को, फिर शरीरधारियों को उत्पन्न किया ।। 5 

यत्पुरु॑षेण ह॒विषा। दे॒वा य॒ज्ञमत॑न्वत ।
व॒स॒न्तो अ॑स्यासी॒दाज्यम्। ग्री॒ष्म इ॒ध्मः श॒रद्ध॒विः । 6

जब देवों ने विराट पुरुष को हवि मानकर यज्ञ का शुभारम्भ किया, तब घृत वसंत ऋतु, ईंधन (समिधा) ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हुई ।।6।।

स॒प्तास्या॑सन्परि॒धयः॑ । त्रिः स॒प्त स॒मिधः॑ कृ॒ताः ।
दे॒वा यद्य॒ज्ञं त॑न्वा॒नाः । अब॑ध्न॒न्पु॑रुषं प॒शुम् । 7

देवों ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उसमें विराट पुरुष को ही पशु (हव्य) रूप की भावना से बाँधा (नियुक्त किया), उसमें यज्ञ की सात परिधियाँ (सात समुद्र) एवं इक्कीस (छंद) समिधाएँ हुईं ।।7।।

तं य॒ज्ञं ब॒र्हिषि॒ प्रौक्षन्॑ । पुरु॑षं जा॒तम॑ग्र॒तः ।
तेन॑ दे॒वा अय॑जन्त । सा॒ध्या ऋष॑यश्च॒ ये । 8

मंत्रद्रष्टा ऋषियों एवं योगाभ्यासियों ने सर्वप्रथम प्रकट हुए पूजनीय विराट पुरुष को यज्ञ (सृष्टि के पूर्व विद्यमान महान ब्रह्मांडरूप यज्ञ अर्थात् सृष्टि यज्ञ) में अभिषिक्त करके उसी यज्ञरूप परम पुरुष से ही यज्ञ (आत्मयज्ञ) का प्रादुर्भाव किया ।।8।।

तस्माद्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॑ । संभृ॑तं पृषदा॒ज्यम् ।
प॒शूꣳस्ताꣳश्च॑क्रे वाय॒व्यान्॑ । आ॒र॒ण्यान्ग्रा॒म्याश्च॒ ये । 9

उस सर्वश्रेष्ठ विराट प्रकृति यज्ञ से दधियुक्त घृत प्राप्त हुआ (जिससे विराट पुरुष की पूजा होती है)। वायुदेव से संबंधित पशु हरिण, गौ, अश्वादि की उत्पत्ति उस विराट पुरुष के द्वारा ही हुई ।।9।।

तस्माद्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॑ । ऋचः॒ सामा॑नि जज्ञिरे ।
छन्दासि जज्ञिरे॒ तस्मात् । यजु॒स्तस्मा॑दजायत । 10

उस विराट यत्र पुरुष से ऋग्वेद एवं सामवेद का प्रकटीकरण हुआ। उसी से यजुर्वेद एवं अथर्ववेद का प्रादुर्भाव हुआ अर्थात् वेद की ऋचाओं का प्रकटीकरण हुआ ।। 10

तस्मा॒दश्वा॑ अजायन्त । ये के चो॑भ॒याद॑तः ।
गावो॑ ह जज्ञिरे॒ तस्मात् । तस्माज्जा॒ता अ॑जा॒वयः॑ । 11

उस विराट यज्ञ पुरुष से दोनों तरफ दाँतवाले घोड़े हुए और उसी विराट पुरुष से गौएँ, बकरियाँ और भेड़ें आदि पशु भी उत्पन्न हुए ।। 11

यत्पुरु॑षं॒ व्य॑दधुः । क॒ति॒धा व्य॑कल्पयन् ।
मुखं॒ किम॑स्य॒ कौ बा॒हू । कावू॒रू पादा॑वुच्येते । 12

संकल्प द्वारा प्रकट हुए जिस विराट पुरुष का ज्ञानी जन विविध प्रकार से वर्णन करते हैं, वे उसकी कितने प्रकार से कल्पना करते हैं ? उसका मुख क्या है ? भुजा, जाँघें और पाँव कौन से हैं ? शरीर-संरचना में वह पुरुष किस प्रकार पूर्ण बना ? 12

 ब्रा॒ह्म॒णोऽस्य॒ मुख॑मासीत् । बा॒हू रा॑ज॒न्यः॑ कृ॒तः ।
ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्यः॑ । प॒द्भ्याꣳ शू॒द्रो अ॑जायत । 13

विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण अर्थात ज्ञानीजन हुए। क्षत्रिय अर्थात् पराक्रमी व्यक्ति, उसके शरीर में विद्यमान बाहुओं के समान हैं। वैश्य अर्थात् पोषणशक्ति-सम्पन्न व्यक्ति उसके जंघा एवं सेवाधर्मी व्यक्ति उसके पैर हुए ! 13

च॒न्द्रमा॒ मन॑सो जा॒तः । चक्षोः॒ सूर्यो॑ अजायत ।
मुखा॒दिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ । प्रा॒णाद्वा॒युर॑जायत । 14

विराट पुरुष की नाभी से अंतरिक्ष, सिर से द्युलोक, पाँवों से भूमि तथा कानों से दिशाएँ प्रकट हुई। इसी प्रकार (अनेकानेक) लोकों को कल्पित किया गया है  ! 14

नाभ्या॑ आसीद॒न्तरि॑क्षम् । शी॒र्ष्णो द्यौः सम॑वर्तत ।
प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रात् । तथा॑ लो॒का अ॑कल्पयन् । 15

उन्हीं विराट् पुरुष की नाभि से अन्तरिक्षलोक, मस्तक से स्वर्ग, पैरों से पृथ्वी, कानों से दिशाएं प्रकट हुईं । इस प्रकार समस्त लोक उस पुरुष में ही कल्पित हुए । 15

वेदा॒हमे॒तं पुरु॑षं म॒हान्तम् । आ॒दि॒त्यव॑र्णं॒ तम॑सस्तु॒ पा॒रे ।
सर्वा॑णि रू॒पाणि॑ वि॒चित्य॒ धीरः॑ । नामा॑नि कृ॒त्वाऽभि॒वद॒न् यदास्ते । 16

तमस् (अविद्यारूप अन्धकार) से परे आदित्यके समान प्रकाशस्वरूप उस महान् पुरुषको मैं जानता हूँ। सबकी बुद्धि मे रमण करनेवाला वह परमेश्वर सृष्टिके आरम्भमें समस्त रूपोंकी रचना करके उनके नाम रखता है; और उन्हीं नामोंसे व्यवहार करता हुआ सर्वत्र विराजमान होता है ॥ 16॥

धा॒ता पु॒रस्ता॒द्यमु॑दाज॒हार॑ । श॒क्रः प्रवि॒द्वान्प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ।
तमे॒वं वि॒द्वान॒मृत॑ इ॒ह भ॑वति । नान्यः पन्था॒ अय॑नाय विद्यते । 17

पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिनकी स्तुति की थी, इन्द्रने चारों दिशाओं में जिसे (व्याप्त) जाना था, उस परम पुरुषको जो इस प्रकार (सर्वस्वरुप​) जानता है, वह यहां अमृतपद (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त​ और कोई मार्ग निज-निवास (स्वस्वरूप या भगवद्धाम) की प्राप्तिक नहीं है ॥ 17॥

य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वाः । तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन् ।
ते ह॒ नाकं॑ महि॒मानः॑ सचन्त । यत्र॒ पूर्वे॑ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः । 18

देवताओंने (पूर्वोक्त रूपसे) यज्ञके द्वारा यज्ञस्वरूप परम पुरुषको यजन (आराधन) किया। इस यज्ञसे सर्वप्रथम सब धर्म उत्पन्न हुए। उन धर्मोंके आचरणसे वे देवता महान् महिमावाले होकर उस स्वर्गलोका सेवन करते हैं, जहाँ प्राचीन साध्यदेवता निवास करते हैं ॥ 18॥ 

अथ नारायणसूक्तम् ॥

अ॒द्भ्यः संभू॑तः पृथि॒व्यै रसा᳚च्च । वि॒श्वक॑र्मणः॒ सम॑वर्त॒ताधि॑ ।
तस्य॒ त्वष्टा॑ वि॒दध॑द्रू॒पमे॑ति । तत्पुरु॑षस्य॒ विश्व॒माजा॑न॒मग्रे᳚ । 

पृथ्वी आदिकी सृष्टिके लिये अपने प्रेमके कारण वह पुरुष जल आदिसे परिपूर्ण होकर पूर्व ही छा गया। उस पुरुषके रूपको धारण करता हुआ सूर्य उदित होता है, जिसका मनुष्यके लिये प्रधान देवत्व ॥ 1॥

वेदा॒हमे॒तं पुरु॑षं म॒हान्तम्᳚ । आ॒दि॒त्यव॑र्णं॒ तम॑सः॒ पर॑स्तात् ।
तमे॒वं वि॒द्वान॒मृत॑ इ॒ह भ॑वति । नान्यः पन्था॑ विद्य॒तेय॑ऽनाय ।

मैं अज्ञानान्धकारसे परे आदित्य प्रतीकात्मक उस सर्वोत्कृष्ट – पुरुषको जानता हूँ। मात्र उसे जानकर ही मृत्युका अतिक्रमण होता है। शरणके लिये अन्य कोई मार्ग नहीं ॥ 2॥

प्र॒जाप॑तिश्चरति॒ गर्भे॑ अ॒न्तः । अ॒जाय॑मानो बहु॒धा विजा॑यते
तस्य॒ धीराः॒ परि॑जानन्ति॒ योनिम्᳚ । मरी॑चीनां प॒दमि॑च्छन्ति वे॒धसः॑ ।

वह परमात्मा आभ्यन्तरमें विराजमान है। उत्पन्न न होनेवाला होकर भी नाना प्रकारसे उत्पन्न होता है। संयमी पुरुष ही उसके स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं। सम्पूर्ण भूत उसीमें सन्निविष्ट हैं  ॥ 3॥

यो दे॒वेभ्य॒ आत॑पति । यो दे॒वानां᳚ पु॒रोहि॑तः ।
पूर्वो॒ यो दे॒वेभ्यो॑ जा॒तः । नमो॑ रु॒चाय॒ ब्राह्म॑ये ।

जो देवताओंके लिये सूर्यरूपसे प्रकाशित होता है, जो देवता कार्यसाधन करनेवाला है और जो देवताओंसे पूर्व स्वयं भूत है देदीप्यमान ब्रह्मको नमस्कार है ॥ 4॥

रुचं॑ ब्रा॒ह्मं ज॒नय॑न्तः । दे॒वा अग्रे॒ तद॑ब्रुवन् ।
यस्त्वै॒वं ब्रा᳚ह्म॒णो वि॒द्यात् । तस्य॑ दे॒वा अस॒न् वशे᳚ ॥ 

उस शोभन ब्रह्मको प्रथम प्रकट करते हुए देवता बोले- जो ब्राह्मण तुम्हें इस स्वरूपमें जाने, देवता उसके वशमें हों ॥ 5॥

श्रीश्च॑ ते ल॒क्ष्मीश्च॒ पत्न्यौ᳚ । अ॒हो॒रा॒त्रे पा॒र्श्वे । नक्ष॑त्राणि रू॒पम् । अ॒श्विनौ॒ व्यात्तम्᳚ ।
इ॒ष्णन्निषाण । अ॒मुं म॑ इषाण । सर्वं॑लोकं म इषाण ॥ 

समृद्धि और सौन्दर्य तुम्हारी पत्नीके रूपमें हैं, दिन तथा रात तुम्हारे अगल-बगल हैं, अनन्त नक्षत्र तुम्हारे रूप हैं, द्यावा-पृथिवी तुम्हार मुखस्थानीय हैं। इच्छा करते समय परलोककी इच्छा करो। मैं सर्वलोकात्मक हो जाऊँ-ऐसी इच्छा करो, ऐसी इच्छा करो ॥ 6॥

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