Jayadeva was a Sanskrit poet during the 12th century. He is most known for his epic poem Gita Govinda which concentrates on Krishna’s love with the gopi, Radha

He was the composer of Dashavatara stotra (दशावतारस्तोत्र)

Dashavatara stotra (दशावतारस्तोत्र)

प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं, विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ।
केशव धृतमीनशरीर, जय जगदीश हरे ॥ १॥

मीनावतारधारी केशव! हे जगदीश्वर! हे हरे! प्रलयकालमें बढ़े हुए समुद्रजल में बिना क्लेश नौका चलाने की लीला करते हुए आपने वेदों की रक्षा की थी, आपकी जय हो !!

क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे,
धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ।
केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ॥ २॥

हे केशव! पृथ्वीके धारण करने के चिह्न से कठोर और अत्यन्त विशाल तुम्हारी पीठ पर पृथ्वी स्थित है, ऐसे कच्छपरूपधारी जगत्पति आप हरि की जय हो ॥

वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना,
शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना ।
केशव धृतसूकररूप, जय जगदीश हरे ॥ ३॥

चन्द्रमा निमग्न हुई कलंकरेखाके पृथ्वी आपके दाँतकी नोकपर अटकी हुई सुशोभि हो रही है, ऐसे सुकररूपधारी जगत्पति हरि केशव जय हो ॥

तव करकमलवरे नखमद्भुतश‍ृङ्गं,
दलित हिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ।
केशव धृतनरहरिरूप, जय जगदीश हरे ॥ ४॥

हिरण्यकशिपुरूपी तुच्छ भृंगको चीर डालनेवाले विचित्र नुकीले नख आपके करकमलमें हैं, ऐसे नृसिंहरूपधारी जगत्पति हरि केशवकी जय हो ॥

छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन,
पदनखनीरजनितजनपावन ।
केशव धृतवामनरूप, जय जगदीश हरे ॥ ५॥

हे आश्चर्यमय वामनरूपधारी केशव! आपने पैर बढ़ाकर राजा बलिको छला तथा अपने चरण के जलसे लोगोंको पवित्र किया, ऐसे आप जगत्पति हरिकी जय हो ॥

क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापं,
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ।
केशव धृतभृगुपतिरूप, जय जगदीश हरे ॥ ६॥

हे केशव! आप जगत्के ताप और पापका नाश करते हुए उसे क्षत्रियोंके रुधिररूप जलसे स्नान कराते हैं, ऐसे आप परशुरामरूपधारी जगत्पति हरिकी जय हो ॥

वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयं,
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ।
केशव धृतरामशरीर, जय जगदीश हरे ॥ ७॥

जो युद्धमें सब दिशाओंमें लोकपालोंको प्रसन्न करनेवाली, रावणके सिरकी सुन्दर बलि देते हैं, ऐसे श्रीरामावतारधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥

वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभं,
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ।
केशव धृतहलधररूप, जय जगदीश हरे ॥ ८॥

जो अपने गौर शरीरमें हलके भयसे आकर मिली हुई यमुना और मेधके सदृश नीलाम्बर धारण किये रहते हैं, ऐसे आप बलरामरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥

निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं,
सदयहृदयदर्शितपशुघातम् ।
केशव धृतबुद्धशरीर, जय जगदीश हरे ॥ ९॥

सदय हृदयसे पशुहत्याकी कठोरता दिखाते हुए यज्ञविधानसम्बन्धी श्रुतियोंकी निन्दा करनेवाले आप बुद्धरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो !!

म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालं,
धूमकेतुमिव किमपि करालम् ।
केशव धृतकल्किशरीर, जय जगदीश हरे ॥ १०॥

जो म्लेच्छसमूहका नाश करनेके लिये धूमकेतुके समान अत्यन्त भयंकर तलवार चलाते हैं, ऐसे कल्किरूपधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥

श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारं,
श‍ृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ।
केशव धृतदशविधरूप, जय जगदीश हरे ॥ ११॥

इस जयदेव कवि की कही हुई मनोहर, आनन्ददायक, कल्याणमय तत्त्वरूप स्तुतिको सुनो, हे दशावतारधारी! जगत्पति, हरि केशव! आपकी जय हो ॥

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