The importance of reading and listening Mahabharata, is mentioned in the epic itself in Svargarohana Parva (स्वर्गारोहणपर्व), chapter 5, verse 80-81

द्वैपायनोष्ठपुटनिस्सृतमप्रमेयं पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च।
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं, किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन।।

Sutji said – One who listen to this matchless, virtuous, holy, pure and blissful Mahabharata which came out of Ved Vyasa’s mouth, he doesn’t require to take bath in Puskhar pilgrimage.

सौति कहते हैं – जो व्यासजीके मुखसे निकले हुए इस अप्रमेय (अतुलनीय), पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारतको दूसरोंके मुखसे सुनता है,उसे पुष्कर तीर्थके जलमें स्नान करनेकी क्या आवश्यकता है?

यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति, विप्राय वेदविदुषे सुबहुश्रुताय।
पुण्यां च भारतकथां सततं शृणोति तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव।।

one who donates hundred cows whose horns are decorated with gold metal to learned Vedic brahmins and one other who listens to Mahabharata , they both will be equally blessed

जो गौओंके  सींगमें सोना मढवाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्राह्मणोंको प्रतिदिन सौ गाएँ दान देता है और जो पुण्यदायनी महाभारत-कथाका श्रवणमात्र करता है—इन दोंनोंमेंसे प्रत्येकको बराबर ही फल मिलता है

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