Vedanta Shruti
Shruti (श्रुति) in Hinduism refers to “that which is heard” — the most authoritative category of sacred texts, considered divine revelation and transmitted orally by ancient rishis who “heard” eternal truths in deep meditation.
In the context of Vedanta (वेदान्त), Shruti primarily points to the Upanishads — the philosophical portions at the conclusion of the Vedic corpus. These form the foundational revealed knowledge for Vedanta philosophy.
Famous Vedanta Shruti
| Shruti Statement | Meaning | Reference |
| तत्त्वमसि | तुम वही हो | Chandogya Upanishad 6.8.7 |
| अयमात्मा ब्रह्म | यह आत्मा ब्रह्म है | Brihadaranyaka Upanishad 4.4.5 |
| प्रज्ञानं ब्रह्म | चेतना ही ब्रह्म है | Aitareya Upanishad 3.1.1 |
| अहं ब्रह्मास्मि | मैं ब्रह्म हूँ | Brihadaranyaka Upanishad 1.4.10 |
| नेति नेति | यह नहीं, यह नहीं | Brihadaranyaka Upanishad 2.3.6 |
| अशनाया हि मृत्युः | भूख ही मृत्यु है | Brihadaranyaka Upanishad 1.2.1 |
| विज्ञानमानन्दं ब्रह्म | ब्रह्म विज्ञान और आनंद स्वरूप है | Brihadaranyaka Upanishad 3.9.7 |
| विज्ञानघन एव | केवल विज्ञानघन ही है | Brihadaranyaka Upanishad 2.4.12 |
| सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म | ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंत है | Taittiriya Upanishad 2.1.1 |
| न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते | द्रष्टा की दृष्टि का विपरिलोप (नाश) नहीं होता | Brihadaranyaka Upanishad 4.3.23 |
| मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति | वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है, जो यहाँ (संसार) में भेद देखता है। | Brihadaranyaka Upanishad 4.4.19 |
| एकधैवानुद्रष्टव्यम् | केवल एक ही रूप में देखना चाहिए | Chandogya Upanishad 6.2.1 |
| श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनः | कान का कान, मन का मन | Kena Upanishad 1.2 |
| नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ | इससे परे कोई दूसरा विज्ञाता नहीं है | Brihadaranyaka Upanishad 3.8.11 |
| प्राणस्य प्राणम् | प्राण का प्राण | Brihadaranyaka Upanishad 4.4.18 |
| यत्र नान्यत्पश्यति | जहाँ कोई अन्य नहीं देखता | Chandogya Upanishad 7.24.1 |
| ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद | ब्रह्म उसे त्याग देता है, जो आत्मा से अलग ब्रह्म को जानता है। | Brihadaranyaka Upanishad 2.4.6 |
| तत्केन कं पश्येद्विजानीयात् | वह (ब्रह्म) किससे किसको देखे या जान ले? | Brihadaranyaka Upanishad 2.4.14 |
| अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद | “वह (ईश्वर) अलग है, मैं अलग हूँ” ऐसा जो जानता है, वह नहीं जानता। | Brihadaranyaka Upanishad 1.4.10 |
| आत्मेत्येवोपासीत | केवल आत्मा ही उपासना करनी चाहिए | Brihadaranyaka Upanishad 1.4.7 |
| देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद | देवता उसे त्याग देते हैं, जो आत्मा से अलग देवताओं को जानता है। | Brihadaranyaka Upanishad 4.5.12 |
| एकधैवानुद्रष्टव्यं सर्वमात्मानं पश्यति | केवल एक ही रूप में देखना चाहिए, सब कुछ आत्मा में देखता है | Brihadaranyaka Upanishad 4.4.20 |
| एकमेवाद्वितीयम् | केवल एक ही है, दूसरा नहीं | chandogya Upanishad 6.2.1 |
| तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः | उस अवस्था में कौन-सा मोह? कौन-सा शोक? — जब कोई एकत्व को देखता है | Isha Upanishad verse 7 |
| तरति शोकमात्मवित् | आत्मा को जानने वाला शोक को पारकर जाता है | Chandogya Upanishad 7.1.3 |
| क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत | हे भारत! क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को एक ही चेतना कृत्स्नं (सम्पूर्ण रूप से) प्रकाशित करती है। | Bhagavata Gita 13.34 |
| तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते | तू वही ब्रह्म जान, न कि यह (ब्रह्म) जिसकी लोग उपासना करते हैं। | Kena Upanishad 1.7 |
| य आत्मापहतपाप्मा | आत्मा पाप से रहित है | Chandogya Upanishad 8.7.1 |
| तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व | तप से ब्रह्म को जानने की इच्छा करो | Taittiriya Upanishad 3.2.1 |
| विद्वान्न बिभेति कुतश्चन | ज्ञानी किसी से भी भय नहीं करता | Taittiriya Upanishad 2.9.1 |
| श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः | श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए | Brihadaranyaka Upanishad 2.4.5 |
| स यो हि वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति | जो व्यक्ति निश्चय ही उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्म ही बन जाता है। | Mundaka Upanishad 3.2.9 |
| वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् | विकार केवल नाम और वाणी से आरम्भ है, नाम मात्र है; मिट्टी ही सत्य है। | Chandogya Upanishad 6.1.4 |
| यत्र नान्यद्विजानाति स भूमा, अथ यत्रान्यद्विजानाति तदल्पम् | जहाँ कोई अन्य नहीं जानता, वही भूमा है; लेकिन जहाँ कोई अन्य जानता है, वह अल्प है। | Chandogya Upanishad 7.24.1 |
| तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् | उसने (ब्रह्म ने) सृष्टि करके उसी में प्रवेश कर गया। | Taittiriya Upanishad 2.6.1 |
| न हि विज्ञतुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति | विज्ञाता की विज्ञान का विपरिलोप (लोप) नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। और वहाँ कोई दूसरा नहीं है। | Brihadaranyaka Upanishad 4.3.30 |
| एतस्मिन्खल्वक्षरे गार्ग्याकाशः | हे गार्गी! निश्चय ही इस अक्षर (ब्रह्म) में आकाश ओत-प्रोत है। | Brihadaranyaka Upanishad 3.8.11 |
| ओमित्येतत् | ओम् — यह अक्षर | Katho Upanishad 1.2.15 |
| ओमिति ब्रह्म | ओम् ही ब्रह्म है | Taittiriya Upanishad 1.8.1 |
| ओङ्कार एवेदं सर्वम् | ओम् ही यह सब कुछ है | Chandogya Upanishad 2.23.3 |
| अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति | यहाँ (स्वप्न में) यह आत्मा अपनी महिमा का अनुभव करता है। | Prasno Upanishad 4.5 |
| आत्मैवेदमग्र आसीत् | आत्मा ही यह सब पहले था | Brihadaranyaka Upanishad 1.4.1 |
| अदृष्टो द्रष्टा | नहीं देखा गया, लेकिन द्रष्टा है | Brihadaranyaka Upanishad 3.7.23 |

















