As mentioned in Mahabharata Udyog Parva, chapter 70, when Dhritarashtra ask about the various name of Sri Krishna to Sanjaya. Following are the names explained by Sanjaya to him.

Vasudev (वासुदेव) and Vishnu (विष्णु)

वसनात्सर्वभूतानां वसुत्वाद्देवयोनितः।
वासुदेवस्ततो वेद्यो बृहत्त्वाद्विष्णुरुच्यते ।।

  • Since Krishna is the abode of all species and he resides in all of them, so he is called as Vasu (वसु), and also he is the place of origin for all devatas, so devatas resides in him, so he is called as Dev (देव). therefore he is called as Vasudev (वासुदेव)
  • Since he is extremely vast, so he is called as Vishnu (बृहत्त्वाद् विष्णुरुच्यते)

भगवान समस्त प्राणियों के निवास स्थान हैं तथा वे सब भूतों मे वास करते हैं, इसलिये ‘वसु’ हैं एवं देवताओं की उत्पत्ति के स्थान होने से और समस्त देवता उनमें वास करते हैं, इसलिये उन्हें ‘देव’ कहा जाता है। अतएव उनका नाम ‘वासुदेव’ है, ऐसा जानना चाहिये। बृहत अर्थात व्यापक होने के कारण वे ही ‘विष्‍णु’ कहलाते हैं।

Madhav (माधव) and Madhuha (मधुहा)

मौनाद्ध्यानाच्च योगाच्च विद्दि भारत माधवम्।
सर्वतत्त्वलयाच्चैव मधुहा मधुसूदनः ।।

  • He is known by silence, meditation and Yoga, therefore know him as Madhav (माधव)
  • Since Krishna is the origin and residing place of this earth which is referred by Madhu word, and other elements, therefore he is called as Madhuha (मधुहा)

हे भारत! मौन, ध्‍यान और योग से उनका बोध अथवा साक्षात्कार होता है; इसलिये आप उन्हें ‘माधव’ समझें। मधु शब्द से प्रतिपादित पृथ्वी आदि सम्पूर्ण तत्त्वों के उत्पादन एवं अधिष्‍ठान होने के कारण भगवान् मधुसूदन को ‘मधुहा’ कहा गया है।

Krishna (कृष्ण:)

कृषिर्भूवाचकः शब्दो गश्च निर्वृतिवाचकः।
विष्णुस्तद्भावयोगाच्च कृष्णो भवति सात्वतः 

  • कृष् dhatu represent the existence and “ण​” word represent bliss or happiness, and Vishnu combing with these two qualities is referred as Krishna (कृष्ण:)

‘कृष’ धातु , सत्ता अर्थ का वाचक है और ‘ण’ शब्द आनन्द अर्थ का बोध कराता है, इन दोनों भावों से युक्त होने के कारण नित्य आनन्दस्वरूप श्रीविष्‍णु ‘कृष्‍ण’ कहलाते हैं।

Pundrikaksha (पुण्डरीकाक्ष​) and Janardana (जनार्दन​)

पुण्डरीकं परं धाम नित्यमक्षयमव्ययम् ।
तद्भावात्पुण्डरीकाक्षो दस्युत्रासाज्जानार्दनः ।।

  • Since Pundrik (पुण्डरीक) is name of the god’s great abode which is ever-present , indestructible and decay-less. Residing there supreme god pervades it therefore he is called as Pundrikaksha (पुण्डरीकाक्ष​)
  • One who give pain to class of evil beings, he is called as Janardana (जनार्दन​)

नित्य, अक्षय, अविनाशी एवं परम भगवद्धाम का नाम पुण्डरीक है। उसमें स्थित होकर जो अक्षतभाव से विराजते हैं, वे भगवान ‘पुण्‍डरीकाक्ष’ कहलाते हैं। दस्युजनों को त्रास (अर्दन/पीड़ा) देने के कारण उनको ‘जनार्दन’ कहते हैं।

Satvata (सत्त्वत), Arshabha (आर्षभ) and Vrishabhekshana (वृषभेक्षणः)

यतः सत्त्वान्न च्यवते यच्च सत्त्वान्न हीयते।
सत्त्वत​: सात्वतस्तस्मादार्षभाद् वृषभेक्षणः ॥

  • He doesn’t part away from truth or renounce it, therefore he is called as Satvata (सत्त्वत). Vedas are called as Arsha (आर्ष), being known from Arsha, therefore god is known as Arshabha (आर्षभ)
  • Vrishabha (वृषभ) also means Vedas, and God is seen through the eyes of Vedas (ईक्षण) , therefore he is called as Vrishabhekshana (वृषभेक्षणः)

वे सत्य से कभी च्युत नहीं होते और न सत्त्व से अलग ही होते हैं, इसलिये सद्भाव के सम्बन्ध से उनका नाम ‘सात्वत’ है। आर्ष कहते हैं वेद को, उससे भासित होने के कारण भगवान का एक नाम ‘आर्षभ’ है। वृषभ का अर्थ है वेद, वही ईक्षण-नेत्र के समान उनका ज्ञापक है; इसके अनुसार वृषभेक्षण नाम की सिद्धि होती है।

Aja (अज​) and Damodar (दामोदर) 

न जायते जनित्राऽयमजस्तस्मादनीकजित् ।
देवानां स्वप्रकाशत्वाद्दमाद्दामोदरो विभुः ।।

  • The conqueror of enemy forces, Krishna is not born form any birth giving species, therefore he is called as Aja (अज​)
  • Devata are self luminous, and since Sri Krishna has highest luminous among them, so is called as Udar (उदर​), and secondly he has quality of senses-control (दम​), so he is referred as Dama ( दाम​). When we combine these two words, we get his name as Damodar (दामोदर) 

शत्रु सेनाओं पर विजय पाने वाले ये भगवान् श्रीकृष्‍ण किसी जन्मदाता के द्वारा जन्म ग्रहण नहीं करते हैं, इसलिये ‘अज’ कहलाते हैं। देवता स्वयं प्रकाशरूप होते हैं, अत: उत्कृष्‍ट रूप से प्रकाशित होने के कारण भगवान् श्रीकृष्‍ण को ‘उदर’ कहा गया है और दम (इन्द्रियसंयम) नामक गुण से सम्पन्न होने के कारण उनका नाम ‘दाम’ है। इस प्रकार दाम और उदर इन दोनों शब्दों के संयोग से वे ‘दामोदर’ कहलाते हैं

Hrishikesha (हृषीकेश) and Mahabahu (महाबाहु)

हर्षात्सुखात्सुखैश्वर्याद्धृषीकेशत्वमश्रुते ।
बाहुभ्यां रोदसी बिभ्रन्महाबाहुरिति स्मृतः ।।

  • He is filled with joy and Happiness so he is Hrishik (हृषीक) and he also have great grandeur so he is called as Isha (ईश) ,therefore the name of god is Hrishikesha (हृषीकेश)
  • Since god hold this earth and sky with his two arms, so he is called as Mahabahu (महाबाहु)

वे हर्ष अथवा सुख से यु‍क्त होने के कारण हृषीक हैं और सुख-ऐश्‍वर्य से सम्पन्न होने के कारण ‘ईश’ कहे गये हैं। इस प्रकार वे भगवान् ‘हृषीकेश’ नाम धारण करते हैं। अपनी दोनों बाहुओं द्वारा भगवान् इस पृथ्‍वी और आकाश को धारण करते हैं, इसलिये उनका नाम ‘महाबाहु’ हैं

Adhokshaja (अधोक्षज) and Narayana (नारायण)

अघो न क्षीयते जातु यस्मात्तस्मादधोक्षजः।
नराणामयनाच्चापि ततो नारायणः स्मृतः ।।

  • Sri Krishna never break when he fall down, so he is called as Adhokshaja ( अधोक्षज – “अघो न क्षीयते जातु”)
  • Since all Jeevatma (नर) takes refuge (अयन) in him , so he is called as Narayana (नारायण)

श्रीकृष्‍ण कभी नीचे गिरकर क्षीण नहीं होते, अत: (‘अधो न क्षीयते जातु’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार) ‘अधोक्षज’ कहलाते हैं। वे नरों (जीवात्माओं) के अयन (आश्रय) हैं, इसलिये उन्हें ‘नारायण’ भी कहते हैं।

Purushottam (पुरुषोत्तम) and Sarva (सर्व)

पूरणात्सदनाच्चापि ततोऽसौपुरुषोत्तमः।
असतश्च सतश्चैव सर्वस्य प्रभवाप्ययात्।
सर्वस्य च सदा ज्ञानात्सर्वमेतं प्रचक्षते ।।

  • He is perfect and best among all other Purusha (पुरुष), so he is called as Purushottam (पुरुषोत्तम)
  • Since he is the origin and resolution of all Sat (Real) and Asat (Unreal), and he always know them so he is called as Sarva (सर्व)

वे सर्वत्र परि‍पूर्ण हैं तथा सबके निवासस्थान हैं, इसलिये ‘पुरूष’ हैं और सब पुरूषों में उत्तम होने के कारण उनकी ‘पुरूषोत्तम’ संज्ञा हैं। वे सत् और असत् सबकी उत्पत्ति और लय के स्थान हैं तथा सर्वदा उन सबका ज्ञान रखते हैं; इसलिये उन्हें ‘सर्व’ कहते हैं।

Satya (सत्य)

सत्ये प्रतिष्ठितः कृष्णः सत्यमत्र प्रतिष्ठितम्।
सत्यात्सत्यं तु गोविन्दस्तस्मात्सत्योपि नामतः ।।

  • Since Sri Krishna resides in truth and truth resides in him, and Bhagawan Govind is greatest truth than the truth himself, so he is called with name as Satya (सत्य)

श्रीकृष्‍ण सत्य में प्रतिष्ठित हैं और सत्य उनमें प्रतिष्ठित है। वे भगवान् गोविन्द सत्य से भी उत्कृष्‍ट सत्य है। अत: उनका एक नाम ‘सत्य’ भी है !

Vishnu , Jishnu , Ananta and Govind

विष्णुर्विक्रमणाद्देवो जयनाञ्जिष्णुरुच्यते।
शाश्वतत्वादनन्तश्च गोविन्दो वेदनाद्भवाम् ।

  • Because he strode in Vamana Avatar, due to that superpower he is called as Vishnu (विष्णु विक्रमणात्)
  • He conquered everyone, so he is called as Jishnu ( जयनात् जिष्णु उच्यते।)
  • Since he is ever-present , so he is called as Ananta (शाश्वतत्वाद् अनन्त:)
  • Since he is knower and the illuminator of the senses (गाम्) , so he is called as Govinda ( गां विन्दति इति गोविन्द)

 विक्रमण (वामनावतार में तीनों लोकों को आक्रान्त) करने के कारण वे भगवान् ‘विष्‍णु’ कहलाते हैं। वे सब पर विजय पाने से ‘जिष्‍णु’, शाश्र्वत (नित्य) होने से ‘अनन्त’ तथा गौओं (इन्द्रियों) के ज्ञाता और प्रकाशक होने के कारण (गां विन्दति) इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘गोविन्द’ कहलाते हैं। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!